कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

"तेरा अधिकार केवल कर्म पर है, फलों पर कभी नहीं।
फल का हेतु तू न बन, और न ही अकर्म में आसक्त हो।" श्रीमद्‌भगवद्‌गीता · २.४७

Three Streams · त्रिवेणी

The Offerings श्रीवत्स की धारा

गीता Geeta

श्रीमद्‌भगवद्‌गीता का श्लोक-दर-श्लोक भावार्थ — सन्दर्भ, अर्थ, और प्रत्येक पंक्ति में बहती जीवन्त चेतना।

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अन्तस् Antas

अन्तरतम — वर्षों के मनन से उद्भूत मूल सिद्धान्त। पठन के पीछे की दिशा-सूई।

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श्रीवचन Srivachan

पावन प्रवचनों का बढ़ता हुआ संग्रह — रिकॉर्डिंग, लिप्यान्तर, और समय के साथ संचित चिन्तन।

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श्री

Srivats श्रीवत्स

श्रीमद्‌भगवद्‌गीता का जीवनभर का अध्येता — ये पठन एक भेंट हैं, उपदेश नहीं। जहाँ शब्द सन्दर्भ बनते हैं, और सन्दर्भ देखने की एक दृष्टि।